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Tuesday, 6 March 2018

डराने वाला खूबसूरत झारखंड, क्योंकि ये पीढ़ियां खराब कर रही है




रांची. पत्थलगड़ी वाले इलाकों में अफीम की खेती हो रही है, ये बात पहले ही दिन भास्कर ने अपनी रिपोर्ट में स्पष्ट किया। मुख्यमंत्री रघुवर दास ने स्पष्ट कहा कि पत्थलगड़ी के पीछे अफीम की खेती है। स्थिति की गंभीरता जानने के लिए अलग-अलग जिलों में भास्कर की टीमों ने 130 किलोमीटर के क्षेत्र में पड़ताल की। राज्य के 24 जिलों में से 10 में बड़े पैमाने पर अफीम की खेती हो रही है। पिछले साल मोटे तौर पर 2700 एकड़ में अवैध रूप से अफीम की खेती की सूचना है। इसमें केवल खूंटी जिले में 1500 एकड़ से अधिक में अफीम उपजाई गई। इसी तरह इस साल अब तक 1700 एकड़ में से केवल खूंटी जिले में 900 एकड़ से अधिक में अफीम की खेती की सूचना है। यह प्रांरभिक सूचना वहां तक की है, जहां हमारी टीम या पुलिस-नारकोटिक्स के अफसर पहुंच सके हैं। इसके अलावे बड़े पैमाने पर वैसे दुर्गम क्षेत्र भी अफीम की खेती हो रही है, जहां पहुंचना नामुमकिन जैसा है।

डर या कमाई :पुलिस यहां कभी जाती ही नहीं
पुलिस कार्रवाई बाहरी इलाकों में दिखावा मात्र तक सीमित है। गांववालों का कहना है कि पुलिस को भी पैसे पहुंचते हैं। वहीं, पुलिस अफसरों का तर्क है कि इन इलाकाें में जाना मतलब जान जोखिम में डालना। 21 फरवरी को खूंटी में एसएसपी और जिला पुलिस की टीम अफीम की खेती नष्ट करने गई थी। लोगों ने परंपरागत हथियारों से घेर लिया और मजबूरन वापस लौटना पड़ा।

राज्य में होने वाली अफीम की कुल खेती का करीब 58% सिर्फ खूंटी में

अंतराष्ट्रीय स्तर पर दुनिया का 43% अफीम की खेती अफगानिस्तान में होती है। यूएन ऑफिस ऑन ड्रग्स एंड क्राइम के अनुसार यहां हर साल नशे की इस खेती में 10% का इजाफा होता है। ठीक इसी तरह, झारखंड में अफीम का अफगानिस्तान खूंटी जिला है। क्योंकि राज्य में होने वाली अफीम की कुल खेती का करीब 58% खूंटी में होता है। भास्कर पड़ताल में यह बात साफ तौर पर सामने आई कि पुलिस और नारकोटिक्स विभाग सिर्फ वहीं तक कार्रवाई कर पाती है जहां तक उन्हें जाने की अनुमति मिलती है।

अफीम की अंतर-राज्यीय स्मगलिंग

1. झारखंड से अफीम को यूपी के बनारस, गोरखपुर, पश्चिम बंगाल के कोलकाता पहुंचाया जाता है। इसके बाद यहां से बड़े सौदागर उसे चेन्नई और बांग्लादेश ले जाते हैं। 
2. चेन्नई और कोलकाता से उत्तर-पूर्वी राज्यों से होते हुए अफीम थाईलैंड, लाओस और म्यांमार जाता है। इस इलाके को अफीम की खेती का गोल्डन ट्रायंगल कहते हैं। 
3. कुछ हिस्सा पंजाब, हरियाणा, जम्मू-कश्मीर, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड और राजस्थान में चला जाता है। जो पाकिस्तान और अफगानिस्तान तक सप्लाई होता है। इसे गोल्डन क्रिसेंट कहते हैं।

अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमत

थोक में लगभग 1.95 लाख रु. प्रति किलो

खुदरा में लगभग 10.40 लाख रु. प्रति किलो

उत्पादन : एक एकड़ में करीब 30 से 40 किलो अफीम की पैदावार होती है।

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