Tuesday, September 21, 2021
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अभी बढ़ती महंगाई से नहीं मिलने वाली है राहत, बिगड़ रहा किचन का बजट तो करें ये उपाय – sports News Hindi Livenow24x7 | Livenow24x7.com

कोरोना वायरस महामारी अभी खत्‍म नहीं हुई और इस बीच आम लोगों के लिए एक और बड़ी समस्‍या आ खड़ी हुई है. बढ़ती महंगाई ने आम लोगों की जेब ढीली करनी शुरू कर दी है. हाल के दिनों में मेटल, पावर और ईंधन की कीमतों में रिकॉर्ड इजाफा देखने को मिला है. यही कारण है कि मई महीने में थोक महंगाई दर छलांग लगाकर 12.94 फीसदी पर पहुंच गई. जबकि, मई महीने में खुदरा महंगाई दर अप्रैल के 4.3 फीसदी की तुलना में बढ़कर 6.3 फीसदी पर पहुंच गई है. रोजमर्रा की जिंदगी में इस्‍तेमाल होने वाली वस्‍तुओं की कीमतों में बढ़ोतरी ही वजह है कि लोगों की खरीद क्षमता कम होने लगी है.

इस साल अब तक खाने के तेल से लेकर दालों तक के दाम में लगातार इजाफा देखने को मिल रहा है.सूरजमुखी के तेल का मासिक औसत भाव 174 रुपये प्रति लीटर पर पहुंच चुका है.
पिछले साल की तुलना में यह 56 फीसदी तक बढ़ा है. बीते एक साल के दौरान अरहर और चना दाल के भाव में रिकॉर्ड इजाफा हुआ है. ध्‍यान देने वाली बात है कि मौजूदा समय में अधिकतर लोग घर से ही काम कर रहे हैं. ऐसे में किचन में खाद्य सामग्री की खपत भी बढ़ी है.

निवेश रिटर्न पर भी महंगाई की मार

बढ़ती कीमत और खपत की वजह से अब किचन का बजट बिगड़ने लगा है. ऐसे में अब हर किसी को यह समझ जाना चाहिए कि बढ़ती महंगाई का असर उनके बजट पर जरूर द‍िखेगा. जानकार तो इस बात की भी आशंका जता रहे कि अगर समय रहते बढ़ती महंगाई पर लगाम नहीं लगाई गई तो लोगों की खरीद क्षमता तो कम होगी ही, साथ में इन्‍वेस्‍टमेंट रिटर्न्‍स पर भी असर पड़ेगा. लेकिन, खास रणनीति के तहत इस संकट का भी सामना किया जा सकता है.

आगे भी क्‍यों बढ़ने वाली है महंगाई?

ऐसे कई कारण है, जिसकी वजह से अनुमान लगाया जा रहा है कि आने वाले समय में महंगाई बढ़ने वाली है. बीते कुछ सप्ताह में ब्रेंट क्रूड का भाव 70 डॉलर प्रति बैरल के पार जा चुका है. पिछले एक साल की तुलना में देखें तो इसमें करीब दोगुना इजाफा हुआ है. देशभर के कई इलाकों में पहले यह 100 रुपये प्रति डॉलर के पार जा चुका है. धातुओं की कीमतों में तेजी तो देखने को मिल ही रही है, आर्थिक रिकवरी के बीच मैन्‍युफैक्‍चरिंग गतिविध‍ियां भी बढ़ने वाली हैं. ऐसे में निकट भविष्‍य में इससे भी राहत मिलते नहीं दिखाई दे रही है.

ग्राहकों पर पड़ेगा लागत की बोझ का असर

आवश्‍यक वस्‍तुओं की कीमतों में इजाफे के जरिए भी वैश्विक महंगाई व‍िकासशील देशों के लिए समस्‍या बनती है. कमोडिटी कीमतों में इजाफे का मतलब है कि रोजमर्रा की चीजें भी महंगी होंगी. ईंधन की कीमतों में इजाफे का असर माल ढुलाई पर अब स्‍पष्‍ट रूप से द‍िखने लगा है. कच्‍चे माल के दाम बढ़ने से कंज्‍यूमर गुड्स की कीमतें बढ़ेंगी. जो उत्‍पादक अभी तक लागत में खुद ही उठा रहे थे, अब उनके लिए भी समस्‍याएं खड़ी हो रही है. उनके पास बढ़ते लागत का बोझ ग्राहकों पर डालने के अलावा और कोई विकल्‍प नहीं है.

महंगाई नहीं विकास है केंद्रीय बैंकों की प्राथमिकता

इसके अलावा दुनियाभर के केंद्रीय बैंक भी नीतिगत दरों में ढील देने के मूड में नहीं है. सुस्‍त पड़ी आर्थिक गतिविधियों के बीच विकसित देश कोरोना संकट से लड़ने के लिए जमकर खर्च कर रहे हैं. अमेरिकी फेड रिज़र्व ने भी संकेत दिया है क‍ि वो बढ़ती महंगाई से लड़ने के लिए तैयार है. आर्थिक विकास और महंगाई के बीच केंद्रीय बैंक आर्थिक विकास पर ही फोकस कर रहे हैं. जानकारों बता रहे हैं कि इस आर्थिक तेजी की भी कीमत चुकानी पड़ेगी. अमेरिका में महंगाई दर पहले ही 5 फीसदी के ऊपर जा चुका है. बीते 3 दशक में ऐसा दूसरी बार ही हुआ है.

आरबीआई के लक्ष्‍य से बाहर जा चुकी है महंगाई

दुनियाभर में बड़े स्‍तर पर बाजार में लिक्विडिटी छोड़ी जा रही है. अभी तक यह एसेट्स में जा रहा था, लेकिन अब यह वस्‍तुओं की कीमतों में इजाफे के लिए भी जिम्‍मेदारी बन रहा है. भारतीय लिहाज से देखें तो आरबीआई लगातार महंगाई दर 6 फीसदी से इसे कम रखने का प्रयास कर रहा है. लेकिन, अनुमान है कि आरबीआई अब भी आर्थिक विकास पर ही अपना ध्‍यान केंद्रित करेगा.

बढ़ती महंगाई से आप कैसे बचें?

अगर महंगाई ऐसे ही बढ़ती रही तो आपकी बचत पर भी इसका असर पड़ेगा. महंगाई बढ़ने के साथ ही लोगों की खरीद क्षमता समय के साथ कम होती जाती है. किसी भी निवेश पर मिलने वाले रिटर्न पर भी इसका असर पड़ता है. ऐसे में आपको इस पर अपना ध्‍यान केंद्रीय करना होगा निवेश पर ज्‍यादा से ज्‍यादा रिटर्न मिल सके.

1. बढ़ती महंगाई का सबसे बड़ा असर आपके बजट पर पड़ेगा. पहले आपने जरूरी खर्च के लिए जितना बजट निर्धारित किया था, अब वह पर्याप्‍त नहीं होगा. ऐसे में सबसे पहले आपको अपने खर्च कम करने होंगे.

2. अगर आने वाले समय में ब्‍याज दरें बढ़ती हैं तो आपको अपने मौजूदा लोन्‍स का रिव्‍यू करना जरूरी होगा. एसबीआई समेत कुछ बैंकों ने पहले ही इसमें इजाफा कर दिया है. जब ब्‍याज दरें बढ़नी शुरू होती हैं तो आमतौर पर बैंक ईएमआई बढ़ाने की जगह अविध बढ़ा देते हैं. इससे आपके द्वारा कुल ब्‍याज भुगतान की रकम बढ़ जाती है. ऐसे में संभव है तो अपने मौजूदा लोन में आंशिक प्रीपेमेंट कर दें. आपकी वरीयता होनी चाहिए कि जितना संभव हो सके, उतना ज्‍यादा रकम बैंक को चुका दें.

3. फाइनेंशियल प्‍लानर्स यह भी मानते हैं कि महंगाई से निपटना है तो इक्विटी में बने रहना चाहिए. लंबी अवधि में इक्विटी में इतनी क्षमता है कि वो महंगाई को काउंटर कर सके. स्‍टॉक मार्केट पर तेल की कीमतों में इजाफे का न‍िगेटिव असर नहीं देखने को मिलता है. बल्कि इसके उलट कई भारतीय स्‍टॉक्‍स ने पहले भी ऐसी स्थिति में बेहतर परफॉर्म किया है.

4. बीते कुछ सालों में सोने की खरीद क्षमता कम नहीं हुई है. करेंसी की तुलना में देखें तो गोल्‍ड सीमित है और बहुत हद तक इसमें सरकारी हस्‍तक्षेप नहीं होता है. बीते समय में भी जब फिएट करेंसी की वैल्‍यू कम हुई है, सोने की वैल्‍यू में कुछ खास गिरावट नहीं देखने को मिली है. इसीलिए महंगाई और अनिश्चितता की स्थिति में सोने के सबसे बेस्‍ट निवेश विकल्‍प में से एक माना जाता है.

अवधि महंगाई दर (%) गोल्‍ड के भाव में बदलाव (%)
2002-12 6.3 18.9
2003-13 6.7 18.8
2004-14 7.3 16.9
2005-15 7.8 15.7
2006-16 8.1 13.1
2007-17 8.0 11.9
2008-18 7.7 9.9
2009-19 7.4 7.9
2010-20 6.9 9.6
2011-21 6.1 8.2

: स्विट्जरलैंड ही नहीं बल्कि इन जगहों पर भी जमा है कई देशों की GDP से ज्‍यादा संपत्ति, चुटकी में खरीद सकते हैं कई देश!

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