Wednesday, September 22, 2021
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कविता: ‘हिंसा होती है वादों से, आश्वासनों से’ – Live News Hindi | Livenow24x7.com

वंदना ग्रोवर कई सालों से हिंदी साहित्य के क्षेत्र में सक्रिय हैं. देश के विभिन्न मंचों से आपका काव्य पाठ होता है. आपकी कविताएं हिंदी ही नहीं बल्कि पंजाबी और मराठी समेत कई भाषाओं में काफी लोकप्रिया हैं. प्रस्तुत हैं वंदना ग्रोवर की कुछ चुनिंदा कविताएं-

-राह तकते कस्बे-

एक कस्बे में जीते हैं कई सपने रोज़
एक राजधानी में मरते हैं कई क़स्बे रोज़
कस्बे के अंदर से गुज़रती है राजधानी जब
हर दिन सवार हो जाते हैं कुछ टुकड़े राजधानी में कस्बे के
राजधानी पकड़ लेती है गिरेबां से
कस्बे की अधूरी इच्छाओं को
जब से घुसी है राजधानी सपनों में
सपने दौड़ने लगे हैं राजधानी की गति से
राजधानी में एक अकेलापन है
एक भीड़ अकेली है राजधानी में
जीने की तमाम कोशिशें
आपको मरने से नहीं रोक पाती
राजधानी में आप जीते हैं अपनी गति से
राजधानी आपको मारती है अपनी गति से
कस्बे तकते रहते हैं राह
वापसियों की…..
मातमपुर्सियों का सिलसिला जारी है ..

-हिंसा होती है खामोशी से-

हिंसा होती है तोपों से, बमों से
हिंसा होती है बंदूकों से, तलवारों से
हिंसा होती है लाठियों से, डंडों से
हिंसा होती है लातों से, घूसों से
हिंसा होती है नारों से, इशारों से
हिंसा होती है वादों से, आश्वासनों से
हिंसा होती है ख़बरों से, अफवाहों से
हिंसा होती है आवाज़ों से, धमाकों से
हिंसा होती है खामोशी से भी.

-मां के घर लौटने की बाट-

किशोरवय बेटियां
जान लेती हैं
जब मां होती है
प्रेम में
फिर भी वह करती हैं
टूट कर प्यार
मां से
एक मां की तरह
थाम लेती है बाहों में
सुलाती हैं अपने पास
सहलाती हैं
समेट लेती हैं उनके आंसूग
त्याग करती हैं अपने सुख का
नहीं करती कोई सवाल
नहीं करती खड़ा
रिश्तों को कटघरे में
अकेले जूझती हैं
अकेले रोती हैं
और
बाट जोहती हैं मां के घर लौटने की

-और हसरत को पी लिया-

बाइक पर उचक कर
दोनों तरफ पैर लटका
बैठने ही वाली थी
वो देर तक बतिया रहे थे हम
और फिर मेरा ध्यान गया
तुम सभी तो मर्द थे
बहुत बतियाना चाहती थी
धुएं के बादल देखकर
लगी थी कसमसाने उंगलियां
जेब में हाथ डाला
निकाल लिया
पकड़ ढीली हो गई थी
जाती हुई सड़क पर आते हुए
नन्हीं सी हसरत जागी थी
सामने पान की दुकान थी
चबा लिया उस हसरत को
सुरूर उतर रहा था आंखों में
नशा तारी था
देखी जो चंद निगाहें
नशा काफूर हो गया
एक और हसरत को पी लिया
बाल्कनी में पैर लटका कर बैठ जाना
रात को बेलाग बाहर निकल जाना
एक आंख बंद कर हंस देना
पिच्च से थूक देना
दो-दो सीढ़ी फलांग कर चढ़ जाना
धौल-धप्पा कर लेना
इससे उससे हाथ मिलाना
हसरतें तो बड़ी नहीं थी
वो औरत होना आड़े आ गया
वो मेरे जैसा नहीं था
मुझमे भी कहां कुछ था उसके जैसा
फिर मेरे अंदर
एक बदलाव ने ली करवट
और बदल दिया मुझे
सारा का सारा
बदलाव की एक लहर
और आई
उसके अंदर
मेरे जैसा हो गया वो
सारा का सारा
फासला दरम्यां
फिर उतना ही रह गया

-बकवास करती थी बहुत-

देखा था
हंसती भी बहुत थी
सोशल थी, वर्कर थी ,
पॉपुलर थी, सेंसिटिव थी

कुछ गलत फहमियां भी थीं उसे
(हो जाती हैं )
इश्क -मुहब्बत में पड़ी नहीं थी
(घनी ज़ालिम थी)
अच्छाइयां भी थीं उसमें
(कविता नहीं लिखती थी)
मर्दों को लम्पट नहीं समझती थी
(पाला जो नहीं पडा था)
गाली-गलौज कर लेती थी
(मौके और दस्तूर के हिसाब से)
हाथापाई भी कर लेती थी
(मन करता तो)
चीखने-चिल्लाने से परहेज़ नहीं करती थी
(यूं बहुत शर्मीली थी )

ये थी-थी क्या लगा रखा है
मरी नहीं है अभी
मरने की प्रक्रिया में हैं …

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