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Sunday, 13 January 2019

तिष्यरक्षिता की यौन इच्छाएं की कहानी सुनकर धन्यवाद दिया ही जाना चाहिए।

पहली पत्नी थी देवी, दूसरी थी कौरवाकि, तीसरी थी पद्मावती, चौथी थी असंधि‍मित्रा और पांचवीं थी तिष्यरक्षिता।


वंशक्रमों से सरोकार रखने वाले बौद्ध ग्रंथों "महावंश" और "दिव्यावदान" में अशोक की इसी अंतिम "अग्रमहिषी" को "तिस्सरक्खा" कहकर पुकारा गया है। वास्तव में पालि साहित्य "तिस्सरक्खा" की दंतकथाओं से भरा हुआ है। कारण, तिष्यरक्ष‍िता अतिशय कामुक थी। जिसे कि अंग्रेज़ी में कहते हैं "निम्फ़ोमैनियाक।" 

शील और संयम के रूपकों को हमेशा अपने औचित्य-निर्वाह के लिए क्लेश और कषाय के दृष्टांतों की आवश्यकता होती है।

तिष्यरक्ष‍िता का विवाह जब अशोक से हुआ, तब अशोक और तिष्यरक्ष‍िता के बीच आयु का बहुत अंतर था। वास्तव में वह अशोक की चौथी पत्नी असंधिमित्रा की परिचारिका थी। उसके सौंदर्य पर अशोक की दृष्ट‍ि पड़ी तो उसे मौर्य सम्राट के रनिवास में स्थान मिल गया। 

अशोक की संतानों में हम महेंद्र और संघमित्रा के बारे में जानते हैं, जिन्होंने विदिशा में बौद्ध धर्म की दीक्षा ली थी और फिर "धम्म" का प्रचार करने "सिंहलद्वीप" चले गए थे। उसके दो अन्य पुत्र तीवर और जलौक थे। लेकिन अशोक का सबसे प्रसिद्ध पुत्र था कुणाल, जो उसे अपनी तीसरी रानी पद्मावती से हुआ था। कुणाल अशोक के पुत्रों में सबसे कुशाग्र था। अशोक ने मन ही मन उसको अपना उत्तराधिकारी चुन लिया था। 

कुणाल की आंखें बहुत सुंदर थीं। वास्तव में कुणाल शब्द का अर्थ ही सुंदर नेत्रों वाला होता है। तिष्यरक्ष‍िता और कुणाल की वय लगभग समान थी। ऐसे में यह अवश्यम्भावी ही था कि कामातुरा तिष्यरक्षिता कुणाल के प्रति आकृष्ट हो जाती। किंतु चूंकि वह अशोक की पत्नी थी, इसलिए कुणाल उसे "माता" कहकर पुकारता था। वह अपनी पत्नी कांचनमाला से भी बहुत प्रेम करता था। 

किंवदंती है कि तिष्यरक्ष‍िता ने कुणाल के समक्ष प्रणय प्रस्ताव रखा। कुणाल ने इससे इनकार कर दिया। आहत होकर तिष्यरक्षिता ने राजाज्ञा जारी करवा दी कि कुणाल की आंखें निकलवा ली जाएं। आदेश का पालन किया गया। जब सम्राट अशोक को इसका पता चला तो उन्होंने तिष्यरक्षिता को जीवित जला देने का आदेश दिया। कालांतर में कुणाल के पुत्र सम्प्रति को अगला मौर्य सम्राट घोषित किया गया।

कुणाल और तिष्यरक्षिता की कहानी के अनेक संस्करण मिलते हैं। 

अनेक विद्वान इस पर एकमत हैं कि कुणाल को अशोक द्वारा तक्षशिला की कमान सौंपी गई थी, लेकिन इस पर संशय है कि क्या कुणाल ने मौर्य साम्राज्य का भी शासन संभाला था। मिथिला में कोसी नदी के तट पर कुनौली (पूर्व में कुणाल ग्राम) नामक गाँव स्थित है और ग्रामीणों का मत है कि कुणाल ने अपना एक समांतर साम्राज्य स्थापित किया था। 

तिष्यरक्षिता की मृत्यु के कारणों और उसकी विधि‍ के बारे में भी अनेक किंवदंतियां प्रचलित हैं। लेकिन जो कुछ बातें निर्विवाद हैं, वे ये हैं कि तिष्यरक्षिता अशोक की सबसे युवा पत्नी थी, वह राजकुमार कुणाल के प्रति आकृष्ट थी और उसी के आदेश पर कुणाल की आंखें निकलवाई गई थीं।

इतिहास जिसे "तथ्य" की तरह दर्ज करता है, लोकापवाद जिसे "कलंक" की तरह अपनी स्मृति में रखता है, साहित्य उसका ही एक संवेदनशील दृष्ट‍ि से मूल्यांकन करता है। 

यही कारण है कि साहित्य में तिष्यरक्षिता के एक सदाशय मूल्यांकन की चेष्टा निरंतर की जाती रही है। रामकुमार वर्मा की एकांकी "चारुमित्रा" और जयशंकर प्रसाद की कहानी "अशोक" में तिष्यरक्षिता मुख्य पात्र की तरह प्रस्तुत है, लेकिन उसके चरित्र पर प्रश्न नहीं उठाए गए हैं। श्रीनरेश मेहता ने तो तिष्यरक्षिता के दृष्ट‍िकोण से ही एक कहानी लिखी है। "तिष्यरक्ष‍िता की डायरी" शीर्षक से यह कहानी उनके पहले कहानी संकलन "तथापि" (1962) में प्रकाशित हुई थी। और इसमें भी तिष्यरक्षिता का पक्ष रखने का प्रयास किया गया है।

मनोवैज्ञानिक दृष्ट‍ि से अगर देखें तो तिष्यरक्षिता के चरित्र की तीन बातें हमें स्पष्ट दिखाई देती हैं। 

पहली है अपनी यौन आकांक्षा की अकुंठ स्वीकृति। दूसरी है ईर्ष्या और प्रतिशोध की तीखी भावना। और तीसरी है राज्यसत्ता के उपकरणों का अपने पक्ष में दोहन। 

वास्तव में इस बात के लिए तो तिष्यरक्षिता को क़तई दोष नहीं दिया जा सकता था कि वह कुणाल के प्रति आकृष्ट हुई। रबींद्रनाथ ठाकुर के उपन्यास "नष्ट नीड़" की नायिका भी ऐसे पुरुष के प्रति आकृष्ट हो गई थी, जो वय में उसके समान होने के बावजूद उसके पुत्र या अनुज के समान था! 

किंतु माता कहकर पुकारने वाले कुणाल के समक्ष तिष्यरक्षिता ने प्रणय प्रस्ताव रखा, यह अपनी यौन आकांक्षाओं के स्वीकार का एक ऐसा उदाहरण है, जो भारतीय इतिहास में दुर्लभ है। 

अपनी यौनिकता को स्वीकार कर पाना आज भी बहुतों के लिए कठिन होता है, तिष्यरक्षिता ने वह दु:साहस आज से 2250 साल पहले किया था। "लोकापवाद" का उसे कोई भय ना था। कुणाल के लिए वह निश्चित ही एक "ओडिपस" ग्रंथि वाला क्षण रहा होगा। चूंकि कोई दुविधा उसके मन में ना थी, इसलिए उसने प्रस्ताव को निरस्त कर दिया। तिष्यरक्षिता तिरस्कार से तिलमिला उठी।

प्रणय प्रस्ताव निरस्त किया जाए, इससे बड़ा अपमान कोई अन्य नहीं हो सकता। स्त्री के लिए तो और अधिक, क्योंकि पहल करने की अपेक्षा उससे नहीं की जाती, जिसके पीछे सामाजिक कारण तो हैं ही, मनोवैज्ञानिक कारण भी हैं। लेकिन अगर स्त्री पहल करेगी तो वह इस बात के लिए क़तई तैयार नहीं रहने वाली है कि उसके प्रस्ताव को ठुकरा दिया जाए। 

पारो ने इसी तरह से देवदास को स्वयं को सौंपा था। देवदास ने अपनी अन्यमनस्कता के चलते पारो को लौटा दिया। आहत होकर पारो ने मन ही मन शपथ ले ली कि अब तुम्हें प्रेम ना करूंगी। मैं बहुधा देवदास की गाथा को पारो द्वारा रचे गए देवदास के ध्वंस के एक रूपक की तरह देखता हूं। 

तिष्यरक्षिता ने रुष्ट होकर कुणाल की आंखें निकलवा ली थीं, पारो ने रुष्ट होकर देवदास के सर्वनाश का आयोजन रचा। ऐसा उसने जानकर किया हो, वैसा नहीं है, लेकिन यह तो स्पष्ट है कि पारो देवदास के समक्ष दूसरी बार प्रणय प्रस्ताव तो ख़ैर नहीं ही रखने वाली थी, देवदास के किंचित देरी से मिले प्रस्ताव को भी स्वीकार करने में अब उसकी रुचि नहीं थी और वह जानती थी कि उसकी उपेक्षा देवदास को नष्ट कर देगी। 

प्रेम में की जाने वाली घृणाएं अत्यंत क्रूर होती हैं।

तिष्यरक्षिता ने मन ही मन कहा होगा कि कुणाल मैं तुम्हारे इन सुंदर नेत्रों पर मुग्ध थी, अब मुझे तुम्हारे यही नेत्र चाहिए! 

राजाज्ञा उसके पास थी। उसने उस अधिकार का अनुचित दोहन किया। परिणाम वह जानती थी। उसे इतने भर से संतोष ना था कि कुणाल उसके प्रणय प्रस्ताव को एक रहस्य ही रखने वाला है और सम्राट को कभी इसकी सूचना नहीं मिलने वाली है और उसकी जगहंसाई नहीं होगी। वह सुरक्षा के बोध भर से संतुष्ट नहीं थी, वह अपने आहत अहं के लिए राजकुमार को दंडित करना चाहती थी, इस क़ीमत पर कि इससे उसका रहस्य खुल जाएगा। और वैसा ही हुआ।

दुनिया में प्रेम की अनेक कहानियां तिष्यरक्षिताओं के डाह से भरी हुई हैं। प्रणय प्रस्ताव ठुकराए जाने से आहत तिष्यरक्ष‍िताएं कुणालों के प्रति ऐसे षड्यंत्र रचने में सक्षम हैं, जिसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती। 

यहां पर "तिष्यरक्षिता" को लैंगिक पहचान से परे एक रूपक माना जाना चाहिए। एक आहत पुरुष भी प्रतिशोध के क्षण में "तिष्यरक्षिता" हो सकता है। किंतु मेरी निजी रुचि स्त्री के प्रतिशोध में अधिक है। कारण, एक तो लैंगिक पूर्वग्रह, और दूसरे आपबीती।

प्रेम अगर एक अंधी लालसा है, तो हमें इस भ्रम में क्यों रहना चाहिए कि प्रेम हमें अनिवार्यत: उदात्त ही बनाएगा? प्रेम बहुधा आत्म के पोषण का ईंधन भी होता है। "मैं प्रेम करता हूं", यह वाक्य बहुधा मेरी व्याप्त‍ि का साधन भी होता है। प्रेम अपनी प्रकृति में मूलत: औपनिवेशिक होता है। वह इस उपनिवेश के बाहर स्थित स्वतंत्र सत्ताओं को बर्दाश्त नहीं कर पाता। 

सम्राट अशोक के हाथ में भारतवर्ष की नियति थी, किंतु उनका मन "कलिंग" में अटका था, जिसने साम्राज्य का हिस्सा बनने से इनकार कर दिया था। और सम्राट की युवा पत्नी का मन राजकुमार कुणाल की आंखों में उलझा था, जिन्होंने उस "परकीया" के प्रणय प्रस्ताव को निरस्त कर दिया था। 

दोनों के अपने-अपने रोष थे। दोनों की अपनी कुंठाएं थीं। 

"राग" शब्द की युति बहुधा "द्वेष" के साथ बनाई जाती है। किंतु इसे "विपर्यय" की तरह नहीं पढ़ा जाना चाहिए, इसे उत्तरोत्तर विकासक्रम की एक संभावना की तरह देखा जाना चाहिए। 

मेरे लिए "राग" का विपर्यय "द्वेष" नहीं है, उल्टे "राग" की ही परिणति "द्वेष" भी हो सकता है।

तिष्यरक्षिताएं प्रेम की हमारी समझ को और व्यापक बना देती हैं, कम से कम इसके लिए तो उन्हें धन्यवाद दिया ही जाना चाहिए। 

इत्यलम्! 

सुशोभित

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